ली कलम और सोचा लिखूं अपने महबूब पर लाइने दो चार, पर दिमाग से पूछा जब सवाल चार तो साला कर दिया प्रेम की परिभाषा प्रसार,
थक हार के जब पहुंचा जब दिल के द्वार तो किये प्रेम की महिमा हजार
कहा इश्क़ की पगडण्डी है पतली और खाई है हद से पार,और लिख ले तू पंक्तियाँ हज़ार पर तेरी पंक्तियाँ न कर सकेगी तेरे मेहबूब का दीदार.
दिमाग की खुरापात और दिल की अफरा तफरी को कर दिया कलम से पार और मन की आग़ोश को दिल के किनारे से दे दिया इश्तेहार
और कह दिया दुनियावालों अगर इश्क़ मुकम्बल करने वाला अगर है गुनाहगार तो ये गुनाह करो हज़ार बार हज़ार बार हज़ार बार
अपनी हर कला का जाल को रूपांतरित करदूँ प्यार में ,जीवन के हर मोड़ पर साथ होगा मेरा साथ चाहे दिन हो या अंधियार में
जूनून-इ-इश्क़ की महताब की खुशबुओं को
को कहदूँ भर दे खुशियां मेरे मेहबूब के दामन में की जैसे निस्वार्थ देता है
पेड़ ,छाँव अपनी आँचल में चाहे उत्कृष्ट गर्मी हो सारे संसार में.
मिळू हर जनम चाहे युद्ध हो सतयुग या हो कंस वध द्वापर के ननिहाल में,
शुभम द्विवेदी
थक हार के जब पहुंचा जब दिल के द्वार तो किये प्रेम की महिमा हजार
कहा इश्क़ की पगडण्डी है पतली और खाई है हद से पार,और लिख ले तू पंक्तियाँ हज़ार पर तेरी पंक्तियाँ न कर सकेगी तेरे मेहबूब का दीदार.
दिमाग की खुरापात और दिल की अफरा तफरी को कर दिया कलम से पार और मन की आग़ोश को दिल के किनारे से दे दिया इश्तेहार
और कह दिया दुनियावालों अगर इश्क़ मुकम्बल करने वाला अगर है गुनाहगार तो ये गुनाह करो हज़ार बार हज़ार बार हज़ार बार
अपनी हर कला का जाल को रूपांतरित करदूँ प्यार में ,जीवन के हर मोड़ पर साथ होगा मेरा साथ चाहे दिन हो या अंधियार में
जूनून-इ-इश्क़ की महताब की खुशबुओं को
को कहदूँ भर दे खुशियां मेरे मेहबूब के दामन में की जैसे निस्वार्थ देता है
पेड़ ,छाँव अपनी आँचल में चाहे उत्कृष्ट गर्मी हो सारे संसार में.
मिळू हर जनम चाहे युद्ध हो सतयुग या हो कंस वध द्वापर के ननिहाल में,
शुभम द्विवेदी
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